
रज्जं खेत्तं अधिवदिगणमप्पाणं च पडिलिहित्ताणं ।
गुणसाधणो पडिच्छदि अप्पडिलेहाए बहुदोसा॥522॥
राज्य क्षेत्र अधिपतिगण अपनी गुण साधक गुरुवर आचार्य ।
करें परीक्षा मुनिवर की, अपरीक्षित में बहु दोष प्रकार॥522॥
अन्वयार्थ : राज्य का स्वामी उनका अवलोकन करें तथा संघ का अवलोकन करे कि संघ वैयावृत्त्य करने में उत्साही है या मन्द है?
अपना सामर्थ्य और समय देखे । सम्यग्दर्शनादि गुणों का साधक जो क्षपक, उसका अवलोकन करे कि यह साधु क्षुधा, तृषा सहने में समर्थ है या नहीं? देह का सुख चाहता है, निरन्तर भोजन चाहता है कि अनेक प्रकार के तपश्चरण करके देह के सुख का त्यागी है? ऐसी परीक्षा करके संन्यास कराते हैं । इतनी योग्यता विचारे बिना संन्यास कराते हैं तो बहुत दोष आते हैं । यदि क्षपक परीषह सहने में कायर हो, पुकारने/चिल्लाने लग जाये तथा मन-वचन-काय की अयोग्य प्रवृत्ति करे तो धर्म की निन्दा होगी और दूसरे साधु धर्म में शिथिल हो जायेंगे । इसलिए क्षपक के परिणामादि का अवलोकन जरूर करें और राज्यक्षेत्रादि योग्य न हो तो दूसरे क्षेत्र में सल्लेखना करावें । यदि अयोग्य क्षेत्र में कराते हैं और राज्यकृत उपद्रव हो तो क्षपक को क्लेश उत्पन्न हो जाये तथा संघ पर उपद्रव आ जाये । अत: परीक्षावान आचार्य सर्व योग्यता देखकर आराधना आरंभ कराये ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यान मरण के चालीस अधिकारों में प्रतिलेखन नामक बीसवाँ अधिकार दो गाथाओं में पूर्ण किया ।
सदासुखदासजी