+ अब आपृच्छा नामक अधिकार एक गाथा में कहते हैं - -
पडिचरए आपुच्छिय तेहिं णिसिट्टं पडिच्छदे खवयं ।
तेसिमणापुच्छाए असमाधी होज्ज तिण्हंपि॥523॥
परिधारक से पूछें सूरि क्षपक को कर लें क्या स्वीकार ।
यदि उनसे नहिं पूछा जाए तो उनकी असमाधि असार॥523॥
अन्वयार्थ : आचार्य/संघ के अधिपति, यद्यपि सर्वसंघ पर उनकी आज्ञा प्रवर्तती है, तथापि बडे कार्य के लिये संघ से पूछते ही हैं, प्रधान/मुख्य मुनियों से पूछे बिना नहीं करते । आचार्य संघ से क्या पूछते हैं, वह कहते हैं - संघ में वैयावृत्त्य करने योग्य धर्मानुरागी वात्सल्य के धारकों से पूछते हैं - भो साधुजनो! सुनिए - रत्नत्रय की आराधना करने में अपनी सहायता चाहते पाहुने/मेहमान मुनि वे अपने संघ को त्यागकर अपने पास आये हैं, तो इन मेहमानरूप मुनि का आपको उपकार करना योग्य है या नहीं? यह कहो । वैयावृत्त्य समान कोई तप नहीं, उपकार नहीं, दान नहीं । वैयावृत्त्य तीर्थंकर प्रकृति के बंध का कारण है और विनाशीक देह की रत्नत्रय के धारकों की वैयावृत्त्य में ही सफलता है तथा ऐसे पात्र का लाभ बडे भाग्य से ही मिलता है । इसलिए आत्महित की इच्छा करनेवाले अपने को अब क्या उचित है? इसप्रकार संघ में प्रधान मुनि या वैयावृत्त्य करने में उद्यमवंत मुनिजनों से पूछते हैं ।
तब संघ के मुनि अंगीकार/स्वीकार करके कहें - हे भगवन्! हे कृपानिधान! हे परम वात्सल्य के धारक! हे स्वामिन्! आपकी आज्ञा हमारा सर्वप्रकार से कल्याण करनेवाली है । हम मन, वचन, काय से सर्व प्रकार आराधना कराने में सावधान हैं । आपके प्रसाद बिना हमें पात्र का लाभ मिलना दुर्लभ है । आपके चरणारविन्दों के प्रसाद से हम क्षपक की वैयावृत्त्य करके अपना जन्म सफल करेंगे, आत्मा को उज्ज्वल करेंगे, परम निर्जरा करेंगे और जैसे धर्म की प्रभावना तथा संघ की प्रभावना, गुरुजनों की प्रभावना हो, वैसा करेंगे । इसप्रकार संघ के प्रधान मुनि अंगीकार करते हैं, तब क्षपक को आराधना के लिये ग्रहण करते हैं ।
यदि संघ को बिना पूछे ग्रहण करेंगे तो क्षपक को, आचार्य को और संघ को क्लेश हो तो सावधानी बिगड जायेगी । कैसे? यह कहते हैं - जब वैयावृत्त्य का प्रयोजन पडे, तब साधु ऐसा कहें कि हमने तो इनको ग्रहण किया नहीं, हम अपने ध्यान, स्वाध्याय में प्रवत~ या इनको धर्मश्रवण करायें? या इनके शरीर की टहल करें? क्या ये हमारे ही भरोसे हैं? क्या संघ में हम ही हैं? वैयावृत्त्य करनेवाले बहुत साधु हैं ही । इसतरह वैयावृत्त्य करने में उद्यमी न हो तो क्षपक के परिणामों में संक्लेश उत्पन्न होगा और गुरु के भी संक्लेश होगा, पर-संघ से आये जो धर्मात्मा साधु उन्हें अंगीकार तो किया । अब इनके उपकार करने में मेरा कोई सहकारी नहीं, कैसे यह कार्य पार पडेगा? ऐसे आचार्य के परिणाम बिगडें और संघ के परिचायक मुनि के भी संक्लेश हो, यह कार्य तो अनेक जनों से साध्य है । गुरु ने हमसे पूछा नहीं, हमारे बल-निर्बल को देखा नहीं, देश-काल का विचार किया नहीं और दुर्धर कार्य आरंभ कर दिया । इस प्रकार क्षपक तथा संघ का परिणाम बिगड जाये, इसलिए आपृच्छा करना/पहले पूछना श्रेष्ठ है ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यान मरण के चालीस अधिकारों में आपृच्छा नामक इक्कीसवाँ अधिकार एक गाथा में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी