पं-सदासुखदासजी
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आगे प्रतीच्छन नामक बाईसवाँ अधिकार तीन गाथाओं में कहते हैं-
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एगो संथारगदो जजइ सरीरं जिणोवदोसेण ।
एगो सल्लिहदि मुणी उग्गेहिं तवोविहाणेहिं॥524॥
एक मुनि संस्तर पर चढ़कर जिनवर की आज्ञा अनुसार ।
आराधन में देह लगाये अन्य1 करे कृश तन तप धार॥524॥
सदासुखदासजी