तम्हा पडिचरयाणं सम्मदमेयं पडिच्छदे खवयं ।
भणदि य तं आयरिओ खवयं गच्छस्स मज्झम्मि॥526॥
अतः एक ही क्षपक करें स्वीकार सूरि यह गण को इष्ट ।
और क्षपक को गण-सन्मुख ही शिक्षा देते हैं वे इष्ट॥526॥
अन्वयार्थ : एक मुनि उग्र तप के विधान द्वारा शरीर को कृश करें । तीसरे मुनि के लिये आज्ञा नहीं, क्योंकि तीन मुनि सल्लेखना करें तो वैयावृत्त्य करनेवालों का व्याघात हो जाये । दो से अधिक की टहल करना कठिन है । दो-तीन संस्तर में पड जाये तो सावधानी रखने के कारण बिगड जाते हैं । इसलिए वैयावृत्त्य करनेवाले मुनियों को एक क्षपक ही इष्ट है - एक ही को अंगीकार करें, क्योंकि एक का ग्रहण टहल करनेवालों को मान्य है । आचार्य संघ के बीच क्षपक को ऐसा कहते हैं, वह आगे कहेंगे ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में प्रतीच्छन नामक बाईसवाँ अधिकार तीन गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी