+ आगे आलोचना नामक तेईसवाँ अधिकार उनचालीस गाथाओं द्वारा कहते हैं - -
फासेहि तं चरित्तं सव्वं सुहसीलयं पयहिदूण ।
सव्वं परीसहचमुं अधियासंतो धिदिबलेण॥527॥
अहो क्षपक! सुखशीलपने को त्याग धैर्य-बल अंगीकार ।
परिषह सेना को जीतो चारित्र समग्र करो स्वीकार॥527॥
अन्वयार्थ : हे मुने! तुम धैर्य के बल से, सम्पूर्ण सुखिया-स्वभाव का त्याग करके और सम्पूर्ण परीषहों की सेना पर जय प्राप्त करते हुए चारित्र को अंगीकार करो ।

  सदासुखदासजी