सद्दे रूवे गंधे रसे य फासे य णिज्जिणाहि तुमं ।
सव्वेसु कसाएसु य णिग्गहपरमा सदा होह॥528॥
इन्द्रिय विषय स्पर्श रूप रस गन्ध शब्द का जीतो राग ।
सर्व कषायों का निग्रह करने में तुम करना अनुराग॥528॥
अन्वयार्थ : हे साधो! तुम शब्द, रूप, गंध, रस, स्पर्श - ये पाँच इन्द्रियों के विषय, इनमें रागभाव पर विजय करो/त्याग करो और सर्व क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों का उत्तम क्षमादि द्वारा निग्रह करने में सदा काल तत्पर होओ ।

  सदासुखदासजी