
हंतूण कसाए इंदियाणि सव्वं च गारवं हंता ।
तो मलिदरागदोसो करेहि आलोयणासुद्धिं॥529॥
इन्द्रिय और कषाय नष्ट करके सब गारव नष्ट करो ।
राग-द्वेष का मर्दन करके आलोचन को शुद्ध करो॥529॥
अन्वयार्थ : हे मुने! कषाय और इन्द्रियों को नष्ट करके, सम्पूर्ण गारव को हन कर/त्याग कर, राग-द्वेष रहित होकर आलोचना की शुद्धता करो ।
सदासुखदासजी