
छत्तीसगुणसमण्णागदेण वि अवस्समेव कायव्वा ।
परसक्खिया विसोधी सुठ्ठुवि ववहारकुसलेण॥530॥
गुण छत्तीस विभूषित एवं जो व्यवहार कुशल अत्यन्त ।
पर-साक्षी में शुद्धि हेतु आलोचन है अवश्य कर्त्तव्य॥530॥
अन्वयार्थ : छत्तीस गुणों के धारक और व्यवहार में प्रवीण, ऐसे आचार्य अपने रत्नत्रय की शुद्धता, पर/अन्य मुनियों की साक्षी से ही करते हैं ।
सदासुखदासजी