आयारवमादीया अट्ठगुणा दसविधो य ठिदिकप्पो ।
बारस तव छावासय छत्तीसगुणा मुणेयव्वा॥531॥
है आचारवान आठ गुण दस प्रकार का स्थितिकल्प ।
बारह तप छह आवश्यक मिलकर होते छत्तीस विकल्प॥531॥
अन्वयार्थ : आचारवानादि पूर्वोक्त अष्टगुण और दस प्रकार स्थितिकल्प, द्वादश प्रकार के तप, षट् आवश्यक - ऐसे छत्तीस गुण आचार्य के कहे हैं । अथवा अन्य ग्रन्थों में पाँच समिति, तीन गुप्ति, अष्ट प्रवचनमातृका और दशलक्षणधर्म अथवा पूर्व में कहे दसप्रकार के स्थितिकल्प, द्वादश प्रकार के तप और षट् आवश्यक, ऐसे आचार्य के छत्तीस गुण कहे हैं - यह जानना ।

  सदासुखदासजी