सव्वे वि तिण्णसंगा तित्थयरा केवली अणंतजिणा ।
छदुमत्थस्स विसोधिं दिसंति ते वि य सदा गुरुसयासे॥532॥
सर्व संग से रहित अनन्त केवली तीर्थंकर कहते ।
छद्मस्थों के दोषों की शुद्धि होती समीप गुरु के॥532॥
अन्वयार्थ : सर्व ही तीर्थंकर, सामान्य केवली, अनंत संसार को जीतनेवाले और संग/परिग्रह से पार उतर गये - ऐसे आचार्य, उपाध्याय, साधु, गणधरादि हैं । इन छद्मस्थों की शुद्धता गुरुओं के निकट ही दिखाई/बताई है । इसलिए पर की साक्षी बिना अतिचारों की शुद्धता नहीं होती ।

  सदासुखदासजी