
एवं जाणंतेण वि पायच्छित्तविधिमप्पणो सव्वं ।
कादव्वादपरविसोधणाए परसक्खिगा सोधी॥534॥
यद्यपि अपने प्रायश्चित की सारी विधि के जाननहार ।
परम विशुद्धि हेतु अन्य-साक्षी में शुद्धि करें आचार्य॥534॥
अन्वयार्थ : ऐसे ही स्वयं सम्पूर्ण प्रायश्चित्त विधि को जानते हुए भी साधु अपनी और पर की शुद्धता के लिए दूसरे आचार्यादि की साक्षी से ही अपने व्रतों की शुद्धता करते हैं ।
सदासुखदासजी