
तम्हा पव्वज्जादी दंसणणाणचरणादिचारो जो ।
तं सव्वं आलोचेहि णिरवसेसं पणिहिदप्पा॥535॥
दीक्षा से जो हुए अभी तक दर्शन-ज्ञान-चरित अतिचार ।
सावधान चित होकर वे सब कह दो तुम समस्त अतिचार॥535॥
अन्वयार्थ : इसलिए सावधान चित्त होकर और जिस दिन दीक्षा ग्रहण की थी, उस दिन से लेकर दर्शन, ज्ञान, चारित्र में जो अतिचार लगे हों, उन सम्पूर्ण और प्रत्येक की आलोचना करना ।
सदासुखदासजी