
काइयवाइयमाणसियसेवणा दुप्पओगसंभूया ।
जइ अत्थि अदीचारं तं आलोचेहि णिस्सेसं॥536॥
मन-वच-काया की प्रवृत्ति में या उनके खोटे उपयोग-
द्वारा जो अतिचार लगे उन सबकी आलोचना करो॥536॥
अन्वयार्थ : जो दुष्टप्रयोग से उत्पन्न काय-वचन-मन - इनसे जो व्रतों की विराधना हुई हो, वह अतिचार है । उन सबकी मन-वचन-काय से उत्पन्न दोष गुरुओं के समीप आलोचना करें, जनावे, प्रगट करें ।
सदासुखदासजी