आलोयणा हु दुविहा ओघेण य होदि पदविभागी य ।
ओघेण मूलपत्तस्स पयविभागी य इदरस्स॥538॥
दो प्रकार आलोचन जानो इक सामान्य रु इतर1 विशेष ।
प्रायश्चित्त है मूल जिसे सामान्य उसे अरु इतर विशेष॥538॥
अन्वयार्थ : आलोचना भी दो प्रकार की है । एक तो ओघ/सामान्य से और दूसरी पदविभागी/विशेषरूप से । उनमें, जिसकी मूल से ही दीक्षा चली गई - ऐसा मूल प्रायश्चित्त को प्राप्त होगा, उसकी तो सामान्य से ही आलोचना होती है और मूलधर्म जिसका नहीं बिगडा, उसकी पदविभागी आलोचना है ।

  सदासुखदासजी