
ओघेणालोचेदि हु अपरिमिदवराधसव्वघादी वा ।
अज्जोपाए इत्थं सामण्णमहं खु तुच्छोत्ति॥539॥
जिसने बहु अपराध किये हैं और किया सब व्रत का घात ।
पुनः आज से दीक्षा चाहूँ मैं हूँ रत्नत्रय में तुच्छ॥539॥
अन्वयार्थ : जिस मुनि को अप्रमाण अपराध लगा हो या सम्पूर्ण रत्नत्रय का घातक अपराध लगा हो, वह ऐसी आलोचना करते हैं - हे भगवन्! आज से मैं मुनिपने की इच्छा करता हूँ/चाहता हूँ । मैं आजपर्यंत श्रमणपने से तुच्छ/हीन हूँ, स्वल्प हूँ, रहित हूँ । अब आज से आप के प्रसाद से नवीन दीक्षाव्रत ग्रहण करना चाहता हूँ ।
सदासुखदासजी