
पव्वज्जादी सव्वं कमेण जं जत्थ जेण भावेण ।
पडिसेविदं तहा तं आलोचिंतो पदविभागी॥540॥
दीक्षा से अब तक जब जैसे जहाँ लगे हों दोष अनेक ।
उनका उस प्रकार आलोचन करना आलोचना विशेष॥540॥
अन्वयार्थ : दीक्षा से लेकर सर्व क्षेत्र-काल में जिस भाव से, जिस अनुक्रम से जो दोष सेवन किये हों, उनकी वैसे ही आलोचना करना, वह पदविभागी आलोचना है ।
सदासुखदासजी