पं-सदासुखदासजी
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अब शल्य का निवारण करने में गुण और शल्यसहित रहने में दोष दिखाते हैं-
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जह कंटएण विद्धो सव्वंगो वेदणुद्धु दो होदि ।
तह्मि दु समुट्ठिदे सो णिस्सल्लो णिव्वुदो होदि॥541॥
जैसे काँटा लगा हुआ हो तो पीड़ा होती सर्वांग ।
काँटा निकल जाए तो वह नर हो निःशल्य भोगे आनन्द॥541॥
सदासुखदासजी