
एवमणुद्धुददोसो माइल्लो तेण दुक्खिदो होइ ।
सो चेव वंददोसो सुविसुद्धो णिव्वुदो होइ॥542॥
इसी तरह नहिं दोष निकाले वह माया से रहे दुःखी ।
दोष प्रकट करने पर वह नर हो विशुद्ध अरु रहे सुखी॥542॥
अन्वयार्थ : जैसे काँटों से वेध्या हुआ पुरुष सर्व अंगों में वेदना द्वारा उपद्रुत होता है, दु:खी होता है, वह काँटे को निकालकर ही शल्यरहित सुखी होता है । तैसे ही जिसने व्रत-संयमादि का दोष दूर नहीं किया है - ऐसा मायाचारी पुरुष भी उस दोषरूप शल्य से दु:खित होता है । वही पुरुष यदि गुरुओं के समीप आलोचना करके दोषों को वमन कर देता है, उगल देता है तो विशुद्ध हो जाने से सुखी हो जाता है ।
सदासुखदासजी