तिविहं तु भावसल्लं दंसणणाणे चरित्तजोगे य ।
सच्चित्ते य अचित्ते य मिस्सगे वा वि दव्वम्मि॥544॥
तीन तरह की भाव-शल्य है दर्शन ज्ञान रु चारित योग ।
द्रव्य शल्य भी तीन सचित्त अचित्त और है मिश्र कहो॥544॥
अन्वयार्थ : उनमें तीन प्रकार की भावशल्य है । उनमें शंका-कांक्षादि दोष लगाना, यह दर्शनशल्य है और अकाल में तथा विनयरहित श्रुत का अध्ययन करना, यह ज्ञानशल्य है । समिति, गुप्ति में अनादर करना, यह चारित्रशल्य है । द्रव्यशल्य भी तीन प्रकार की है - दासी- दासादि की सचित्तद्रव्यशल्य है । सुवर्णादि सम्बन्धी अचित्तद्रव्यशल्य है । ग्राम-नगरादि सम्बन्धी मिश्रद्रव्यशल्य है ।

  सदासुखदासजी