
एगमवि भावसल्लं अणुद्धरित्ताण जो कुणइ कालं ।
लज्जाए गारवेण य ण सो हु आराधओ होदि॥545॥
रहे एक भी भाव-शल्य यदि लज्जा अथवा गारव से ।
क्षपक मरण को प्राप्त करे यदि तो वह अनु-आराधक है॥545॥
अन्वयार्थ : जो साधु लज्जा या गारव से एक भी भावशल्य को दूर किये बिना मरण करता है, वह मुनि आराधक नहीं है ।
सदासुखदासजी