
कल्ले परे व परदो काहं दंसणचरित्तसोधित्ति ।
इय संकप्पमदीया गयं पि कालं ण याणंति॥546॥
कल-परसों मैं शुद्धि करूँगा दर्श ज्ञान अरु चारित की ।
बीत रहा है काल न जाने यह संकल्प करे जो मुनि॥546॥
अन्वयार्थ : दर्शन तथा चारित्र में लगे अतिचारों की आलोचना कल करके गुरुओं द्वारा दिया गया प्रायश्चित्त ग्रहण करके शुद्ध करूँगा, या परसों करूँगा या अगले दिन करूँगा - ऐसे संकल्प करने वाली है बुद्धि जिसकी, वह साधु बहुत काल निकल जाता है, उसे नहीं जानता । इसलिए अतिचार लगे तो काल का विलंब नहीं करना, शीघ्र ही गुरुओं के निकट जाकर आलोचना करके दोष के अनुकूल गुरुओं द्वारा दिया गया प्रायश्चित्त ग्रहण करके शुद्ध करना योग्य है ।
सदासुखदासजी