रागद्दोसाभिहदा ससल्लमरणं मरंति जे मूढा ।
ते दुक्खसल्लबहुले भमंति संसारकांतारे॥547॥
राग-द्वेष से पीड़ित जो मुनि शल्य सहित ही मरण करें ।
बहु दुःख शल्य भरे भव-वन में एेसे मुनि चिरकाल भ्रमें॥547॥
अन्वयार्थ : जो राग-द्वेष से पीडित ऐसे मूढ मुनि शल्यसहित मरण करते हैं, वे दु:खशल्य से भरे हुए संसारवन में परिभ्रमण करते हैं ।

  सदासुखदासजी