तिविहं पि भावसल्लं समुद्धरित्ताण जो कुणदि कालं ।
पव्वज्जादी सव्वं स होइ आराधओ मरणे॥548॥
दीक्षा के दिन से ही तीनों भाव-शल्य परित्याग करें ।
मरण समय में एेसे मुनिवर दर्शनादि आराधक हों॥548॥
अन्वयार्थ : जो दीक्षा ग्रहण करने के दिन से लेकर तीन प्रकार की भावशल्यों को निकाल करके मरण करता है, उसके मरण में आराधना होती है ।

  सदासुखदासजी