
जे गारवेहिं रहिदा णिस्सल्ला दंसणे चरित्ते य ।
विहरंति मुत्तसंगा खवंति ते सव्वदुक्खाणि॥549॥
गारव रहित नि:शल्य विचरते हुए मूर्च्छा को त्यागें ।
दर्शन-ज्ञान-चरित में विचरें सर्व दुःखों का नाश करें॥549॥
अन्वयार्थ : जो तीन गारव रहित, तीन शल्यरहित और परिग्रह में मूर्च्छारहित होकर दर्शन, ज्ञान, चारित्र में विहार/विचरण करते हैं, प्रवृत्ति करते हैं, वे संसार के सर्व दु:खों का क्षय करते हैं ।
सदासुखदासजी