तं एवं जाणंतो महंतयं लाभयं सुविहिदाणं ।
दंसणचरित्तसुद्धो णिस्सल्लो विहर तो धीर॥550॥
इसप्रकार तुम संयमियों के इन महान गुण को जानो ।
दर्शन-चारित्र की शुद्धि कर, हो निःशल्य शिवपथ विचरो॥550॥
अन्वयार्थ : हे मुने! हे वीर! संयमियों के ऐसे महान लाभ को जाननेवाले तुम दर्शन, ज्ञान, चारित्र से शुद्ध शल्यरहित होकर मार्ग में प्रवर्तन करो ।

  सदासुखदासजी