तम्हा सतूलमूलं अविछूढमविप्पुदं अणुंविग्गो ।
णिम्मोहियमणिगूढं सम्मं आलोचए सव्वं॥551॥
अतः बड़े छोटे सब ही दोषों को सम्यक् शीघ्र कहो ।
बिन भूले अरु बिना छिपाये निर्भय अरु निर्माेही हो॥551॥
अन्वयार्थ : अत: शल्यसहित मरण में दोष और नि:शल्यमरण में सर्व कर्म का अभाव करके जन्म-मरण रहित अनन्त सुख को प्राप्त होता है । इसलिए निरवशेष, विस्मरणतारहित, शीघ्रतासहित, उद्वेगरहित, मूढतारहित संपूर्ण सत्यार्थ आलोचना करना ।

  सदासुखदासजी