जह बालो जंपंतो कज्जमकज्जं व उज्जुअं भणइ ।
तह आलोचेदव्वं मायामोसं च मोत्तूणं॥552॥
जैसे बालक सरल भाव से कार्य-अकार्य सभी कहता ।
वैसे माया-मृषा छोड़ आलोचन है कर्त्तव्य कहा॥552॥
अन्वयार्थ : जैसे बालक कार्य को या अकार्य को भी सरलता से कह देता है, तैसे ही धर्मात्मा साधुजन को भी मायाचार तथा झूठ को त्याग करके गुरुओं से सत्य कह देनायोग्य है ।

  सदासुखदासजी