
दंसणणाणचरित्ते कादूणालोचणं सुपरिसुद्धं ।
णिस्सल्लो कदसुद्धी कमेण सल्लेहणं कुणसु॥553॥
दर्शन-ज्ञान-चरित सम्बन्धी कहकर अपने दोषों को ।
हो नि:शल्य परिशुद्ध, गुरु-कथित क्रम से सल्लेखना करो॥553॥
अन्वयार्थ : भो मुने! दर्शन, ज्ञान, चारित्रसंबंधी शुद्ध आलोचना करके और माया शल्यरहित होकर, की है भावों की शुद्धता जिसने - ऐसे गुरुओं द्वारा कहा गया प्रायश्चित्त ग्रहण करके सूत्रोक्त क्रम से सल्लेखना करोे ।
सदासुखदासजी