पं-सदासुखदासजी
तो सो एवं भणिओ अब्भुज्जदमरणणिच्छिदमदीओ ।
सव्वंगजादहासो पीदीए पुलइदसरीरो॥554॥
इसप्रकार वह गुरु-शिक्षित मुनि देह छोड़ने को तैयार ।
रोम-रोम पुलकित हो जाता हर्ष सभी अंगों में व्याप्त॥554॥
सदासुखदासजी