
पाचीणोदीचिमुहो चेदियहुत्तो व कुणदि एगंते ।
आलोयणपत्तीयं काउस्सग्गं अणाबाधे॥555॥
निर्जन थल में पूरब उत्तर या जिन-प्रतिमा सन्मुख हो ।
विघ्न रहित थल में आलोचन हेतु काय-उत्सर्ग करे॥555॥
अन्वयार्थ : ऐसे गुरुओं द्वारा शिक्षित किया हुआ तथा समाधिमरण में निश्चयरूप है बुद्धि जिनकी और सर्व अंगों में उत्पन्न हुआ है हर्ष जिन्हें तथा रोमांचित है शरीर जिनका और पूर्वदिशा के सन्मुख अथवा उत्तर दिशा के सन्मुख अथवा चैत्य/जिनप्रतिबिम्ब उनके सन्मुख होकर एकांत में लोकों के आने-जाने से रहित स्थान में आलोचना के लिये कायोत्सर्ग करें ।
सदासुखदासजी