
एवं खु वोसरित्ता देहे वि उवेदि णिम्मत्तं सो ।
णिम्ममदा णिस्संगो णिस्सल्लो जाइ एयत्तं॥556॥
करता हूँ मैं देह त्याग - यह कहे देह से निर्मम हो ।
निर्ममता से हो नि:संग निःशल्य प्राप्त एकत्व करे॥556॥
अन्वयार्थ : ऐसी आलोचना के लिये एकांत में पूर्वसन्मुख या उत्तरसन्मुख या जिनप्रतिमा, जिनमन्दिर के सन्मुख होकर निर्विघ्न आलोचना करने को कायोत्सर्ग करके देह से ममता त्याग करके निर्ममत्वपने को प्राप्त होता है । पश्चात् निर्ममत्वपने के द्वारा परिग्रहरहित होकर शल्यरहित एकांत स्थान में गमन करें ।
सदासुखदासजी