तो एयत्तमुवगदो सरेदि सव्वे कदे सगे दोसे ।
आयरियपादमूले उप्पाडिस्सामि सल्लत्ति॥557॥
एकत्व प्राप्त वह साधु स्वयं के दोष पूर्वकृत करता याद ।
गुरु-चरणों में शल्य करूँ निर्मूल - करे एेसा सुविचार॥557॥
अन्वयार्थ : ऐसे एकांत को प्राप्त होकर, एकत्व भावना को प्राप्त हो और सर्व किये गये दोषों का स्मरण करें, चिंतवन करंे । वह एकत्वभावना को कैसे प्राप्त होगा? वह कहते हैं - "मैं आत्मा निरतिचार दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वरूप हूँ, यह शरीर मेरे से भिन्न है, कृतघ्न है, मेरा उपकारी नहीं । क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, रोग, व्याधि उत्पन्न कर मुझे दु:ख देने का ही निमित्त है, अवश्य विनाशीक है । ऐसे शरीर के विनाश होने से क्या मेरा विनाश होगा? अब इसे कृश करना योग्य है; और यदि शरीर स्वच्छन्द-सुखिया हो जायेगा तो प्रमाद, काम, निद्रा, विषयतृष्णा उत्पन्न करके मेरा नाश करेगा । इसलिए देह से ममता त्याग और गुरुओं द्वारा दिया गया प्रायश्चित्त ग्रहण करके मेरे रूप को शुद्ध करने के लिये आचार्य के चरणों की निकटतापूर्वक शल्य को उखाड कर मेरा रूप उज्ज्वल करूँगा" ।

  सदासुखदासजी