
इय उजुभावमुपगदो सव्वे दोसे सरित्तु तिक्खुत्तो ।
लेस्साहिं विसुज्झंतो उवेदि सल्लं समुद्धरिदुं॥558॥
सरल भाव को प्राप्त क्षपक वह याद करे सब दोष त्रिबार ।
लेश्याओं से हो विशुद्ध होने निशल्य जाए गुरु-पास॥558॥
अन्वयार्थ : ऐसे सरलभाव को प्राप्त हुआ जो क्षपक, वह सम्पूर्ण दोषों का तीन बार स्मरण करके और लेश्या की सरलता से उज्ज्वलता होने पर शल्य को उखाडने के लिये गुरुओं को प्राप्त होता/करता है ।
सदासुखदासजी