आलोयणादिया पुण होइ पसत्थे य सुद्धभावस्स ।
पुव्वण्हे अवरण्हे व सोमतिहिरक्खवेलाए॥559॥
फिर शुभ-दिन-नक्षत्र समय में प्रातः अथवा साँझ समय ।
आलोचन करता है वह परिणाम विशुद्धि युक्त क्षपक॥559॥
अन्वयार्थ : शुद्धभाव का धारक जो क्षपक, उनके पूर्वाःकाल में, अपराःकाल में तथा सौम्य तिथि, नक्षत्र बेला में आलोचनादि होती है ।

  सदासुखदासजी