
णिप्पत्तकंटइल्लं विज्जुहदं सुक्खरुक्खकडुदढ्ढां ।
सुण्णधररुद्ददेउल - पत्थररासिट्टियापुंजं॥560॥
तणपत्तकट्ठछारिय असुइ सुसाणं च भग्गपडिदं वा ।
रुद्दाणं खुद्दाणं अधिउत्ताणं च ठाणाणि॥561॥
अण्णं व एवमादी य अप्पसत्थं हवेज्ज जं ठाणं ।
आलोचणं ण पडिच्छदि तत्थ गणी से अविग्घत्थं॥562॥
पत्र रहित सूखे तरु अथवा दावानल से जले हुए ।
कटु रसवाले, शून्यागार, रुद्र-मन्दिर अथवा खंडहर॥560॥
तृण पत्ते अरु काष्ठ तथा टूटे पात्रों से भरी जगह ।
रुद्रादिक देवों का स्थल नीच जनों से भरी जगह॥561॥
इसप्रकार के अन्य और भी जो हैं अप्रशस्त स्थान ।
सूरि न आलोचना करायें क्षपक समाधि निर्विघ्नार्थ॥562॥
सदासुखदासजी