
अण्णं च एवमादिय सुपसत्थं हवइ जं ठाणं ।
आलोयणं पडिच्छदि तत्थ गणी से अविग्घत्थं॥564॥
अन्य और भी जो सुन्दर स्थल हों वहाँ श्री आचार्य ।
हो समाधि निर्विघ्न क्षपक की आलोचना करें स्वीकार॥564॥
अन्वयार्थ : अरहन्त का मन्दिर हो, सिद्धों का मन्दिर हो अथवा जिन पर्वतादि में अरहन्तसिद्धों की प्रतिमा हो, समुद्र के समीप हो, कमलों के सरोवरों की समीपता हो, क्षीरवृक्ष हो, पुष्पफलों से संयुक्त ऐसे वृक्ष की निकटता हो; उद्यान, वन, बागों के महल हों, तोरणद्वारों का धारकयुक्त महल हो, नागकुमार देवों तथा यक्ष देवों के स्थान हों और भी सुन्दर स्थान हों; उन स्थानों में आचार्य, क्षपक की निर्विघ्न आराधना के लिये आलोचना ग्रहण करें ।
सदासुखदासजी