
पाचीणोदीचिमुहो आयदणमुहो व सुहणिसण्णो हु ।
आलोयणं पडिच्छदि एक्को एक्कस्स विरहम्मि॥565॥
पूरव उत्तर या जिनमन्दिर सन्मुख हो बैठें आचार्य ।
निर्जन थल में बैठ क्षपक की आलोचना सुनें आचार्य॥565॥
अन्वयार्थ : आचार्य भी आलोचना श्रवण करने के समय पूर्व सन्मुख या उत्तर सन्मुख अथवा जिनमन्दिर के सन्मुख सुख से तिष्ठ कर एकाकी/एकांत स्थान में एक/क्षपक की आलोचना श्रवण करें । जिससे सूर्य की तरह पापतिमिर का अभाव करके क्षपक के शुद्ध परिणामों का उदय चाहें, इसलिए पूर्वसन्मुख और विदेहक्षेत्र में विराजमान तीर्थंकरों के ध्यान के लिये उत्तरदिशा के सन्मुख अथवा भावों की उत्तर/सर्वोत्कृष्टता के लिये उत्तरसन्मुख और अशुभ परिणामों के अभाव के लिये जिनमन्दिर के सन्मुख अथवा कर्मवैरी को जीतने को जिनमन्दिर या जिनप्रतिमा के सन्मुख होकर आलोचना ग्रहण करते हैं । एकांत में एक गुरु सुननेवाले और एक क्षपक कहनेवाले के ही शुद्ध आलोचना होती है । तीसरे और कोई हो तो लज्जा से, अभिमान से दोनों के परिणाम बिगड जायें । इसलिए तीसरे का होना योग्य नहीं ।
सदासुखदासजी