काऊण य किरियम्मं पडिलेहणमंजलीकरणसुद्धो ।
आलोएदि सुविहिदो सव्वे दोसे पमोत्तूणं॥566॥
कर कृति-कर्म क्षपक अरु अंजलि जोड़ करे फिर प्रतिलेखन ।
सर्व दोष परित्याग करें वह भाव शुद्धि से आलोचन॥566॥
अन्वयार्थ : सुविहित जो साधु वे पिच्छिकासहित हस्तांजलि से शुद्ध हों और गुरुओं की वन्दना करके तथा आलोचना के आगे कहेंगे जो दश दोष, उनका त्याग करके आलोचना करना ।
इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानमरण के चालीस अधिकारों में आलोचना नामक तेईसवाँ अधिकार उनचालीस गाथाओं में पूर्ण किया ।

  सदासुखदासजी