
आकम्पिय अणुमाणि य जं दिट्ठं बादरं च सुहुमं च ।
छण्णं सद्दाउलयं बहुजण, अव्वत्त तस्सेवी॥567॥
आकम्पित अनुमानित बाहर सूक्ष्म दृष्ट अरु छन्न सुजान ।
बहुजन पृच्छा शब्दाकुलित अव्यक्त और तदसेनी मान॥567॥
अन्वयार्थ : आकम्पित, अनुमानित, दृष्ट, बादर, सूक्ष्म, छन्न शब्दाकुलित, बहुजन, अव्यक्त, तत्सेवी - आलोचना के ये दश दोष हैं ।
सदासुखदासजी