
भत्तेण व पाणेण व उवकरणेण किरियकम्मकरणेण ।
अणुकंपेऊण गणिं करेइ आलोयणं कोइ॥568॥
भक्त पान उपकरण आदि या वन्दनादि करके कृतिकर्म ।
गुरु की अनुकम्पा पाकर फिर क्षपक कोई निज दोष कहे॥568॥
अन्वयार्थ : भोजन-पान द्वारा, उपकरण द्वारा तथा कृतिकर्म वन्दना द्वारा, गणी अर्थात् आचार्य की अपने पर अनुकम्पा प्राप्त करके आलोचना करे, उसे आकम्पित दोष है ।
सदासुखदासजी