
आलोइदं असेसं होहिदि काहिदि अणुग्गहमिमोत्ति ।
इय आलोचंतस्स हु पढमो आलोयणादोसो॥569॥
यदि गुरु का हो अनुग्रह मुझ पर तभी कहूँगा सारे दोष ।
यह विचार कर दोष कथन - यह कहलाता आकम्पित दोष॥569॥
अन्वयार्थ : आलोचना करनेवाले कोई साधु मन में इसप्रकार का चिंतवन करें कि यदि हमारे ऊपर गुरु अनुग्रह करेंगे तो सम्पूर्ण आलोचना करूँगा । इसप्रकार चिंतवन करके आलोचना करते हैं, उनको पहला आकम्पित नामक दोष लगता है ।
सदासुखदासजी