+ उसी को दृष्टांत द्वारा कहते हैं- -
केदूण विसं पुरिसो पिएज्ज जह कोइ जीविदत्थीओ ।
मण्णंतो हिदमहिदं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥570॥
जैसे जीने का अभिलाषी कोई नर विषपान करे ।
वैसे ही शुद्धि का वांछक हो सशल्य निज दोष कहे॥570॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई पुरुष जीवित रहने के लिये नया विष बनाकर उसे पीवे, तैसे ही अज्ञानी जीव अहित को हितरूप मानकर अपने दोष दूर करने के लिये मायाचार सहित आलोचना करके दोष दूर करना चाहता है ।

  सदासुखदासजी