वण्णरसगंधजुत्तं किंपाकफलं जहा दुहविवागं ।
पच्छा णिच्छयकडुयं तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥571॥
यथा वर्ण-रस-गन्ध सहित, पर दुःखमय होता फल किंपाक ।
वैसे इस आलोचन शुद्धि का फल निश्चित कटुक विपाक॥571॥
अन्वयार्थ : जैसे किंपाकफल वर्ण/रूप की अपेक्षा सुन्दर (अच्छा दिखता) है और रस/ आस्वाद की अपेक्षा भी सुन्दर (स्वादिष्ट) है तथा गंध भी सुन्दर/अच्छी है, परंतु परिपाक काल में महादु:ख रूप मरण करानेवाला है तथा भोगने के बाद निश्चित ही कटुक/जहर है । तैसे ही आकम्पित दोष सहित आलोचना करना ऐसा है, जिससे बाह्य में स्वयं को या पर को तो प्रगट दिखे कि ऐसी शल्य का उद्धार/निवारण करके व्रत शुद्ध किये, परंतु मायाचार से महा कर्मबंधन करके आत्मा को संसार में डुबा देता है ।

  सदासुखदासजी