किमिरागकंबलस्स व सोधी जदुरागवत्थसोधीव ।
अवि सा हवेज्ज किह इण तधिमा सल्लुद्धरणसोधी॥572॥
ज्यों कृमि राग कामली1 अथवा लाख रंग से वस्त्र रँगा ।
शुद्ध न होता वैसे ही हो सके नहीं इसकी शुद्धि॥572॥
अन्वयार्थ : कृमि के रंग से युक्त जो कंबल अथवा लाख के रंग से संयुक्त रोम का वस्त्र या रेशम का वस्त्र, उसे जलादि द्वारा बहुत धोने पर भी उज्ज्वल/साफ नहीं होता । वैसे ही आकम्पित दोषसहित की हुई आलोचना शल्य का उद्धार कर/निकालकर रत्नत्रय की शुद्धता नहीं करती । ऐसा आलोचना का आकम्पित नामक प्रथम दोष का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी