
धीरपुरिसचिण्णाइं पवददि अतिधम्मिओ व सव्वाइं ।
धण्णा ते भगवंता कुव्वंति तवं विकट्ठं जे॥573॥
थामापहारपासत्थदाए सुहसीलदाए देहेसु ।
वददि णिहीणो हु अहं जं ण समत्थो अणसणस्स॥574॥
जाणह य मज्झ थामं अंगाणं दुब्बलदा अणारोगं ।
णेव समत्थोमि अहं तवं विकट्ठं पि कादुं जे॥575॥
आलोचेमि य सव्वं जइ मे पच्छा अणुग्गहं कुणह ।
तुज्झ सिरीए इच्छं सोधी जह णिच्छरेज्जामि॥576॥
अणुमाणेदूण गुरुं एवं आलोचणं तदो पच्छा ।
कुणइ ससल्लो सो से विदिओ आलोचणा दोसो॥577॥
अति धार्मिक वत् कहता है मुनि आलोचन करनेवाला ।
धन्य महा महिमाशाली है उत्तम तप करनेवाला॥573॥
अपनी शक्ति छिपाता, अरु पार्श्वस्थ1 तथा तन में सुखशील ।
कहता मैं जघन्य प्राणी हूँ अनशन करने मैं अतिहीन॥574॥
आप जानते मेरे बल को उदराग्नि है अति दुर्बल ।
मैं रोगी हूँ अतः नहीं सक्षम तप करने में उत्कृष्ट॥575॥
करूँ सर्व अतिचार कथन यदि आप कृपा कर दें मुझ पर ।
शुद्धि चाहता आप शरण में जिससे होऊँ भव दधि पार॥576॥
गुरुवर मुझ पर कृपा करेंगे मुनि एेसा अनुमान करे ।
फिर आलोचन करे सशल्य यही आलोचन2 दोष कहें॥577॥
अन्वयार्थ : गुरुजनों से विनती करते हैं, जनाते हैं कि हे भगवन्! इस अवसर में धीर पुरुषों द्वारा किया गया जो आचरण ऐसे सकल उत्कृष्ट तप करते हैं, वे अति धर्मात्मा हैं, वे जगत में धन्य हैं, महिमावान हैं, मैं तो हीन हूँ, शक्ति की हीनता से अनशन तप करने में समर्थ नहीं, ऐसे देह में सुखिया-स्वभाव के कारण तथा पार्श्वस्थपने से गुरुओं को अपनी हीनता बताते हैं और कहते हैं कि हमारा बल, अंगों की दुर्बलता और रोगीपना हे गुरु आप जानते हैं । इस कारण मैं उत्कृष्ट तप करने में समर्थ नहीं हूँ । आप यदि सानुग्रह करें तो बाद में मैं भी सभी आलोचना करूँगा ।
हे भगवन्! आपकी कृपा रूपी लक्ष्मी से मेरा जैसे निस्तार होगा, वैसे शुद्धता करना चाहता हूँ । इसप्रकार गुरुओं को अनुमान कराके फिर बाद में यदि शल्यसहित मुनि आलोचना करते हैं, उन्हें अनुमानित नामक दूसरा दोष आलोचना में आता है ।
सदासुखदासजी