
गुणकारिओत्ति भुंजइ जहा सुहत्थी अपत्थमाहारं ।
पच्छा विवायकडुगं तधिमा सल्लद्धरणसोधी॥578॥
ज्यों सुख वांछक नर अपथ्य भोजन को गुणमय जान ग्रहे ।
किन्तु विपाक दुखद है वैसे मुनि सशल्य यह शुद्धि करे॥578॥
अन्वयार्थ : जैसे कोई रोगी सुखी होने के लिए परिपाक में अति कडवा अपथ्य आहार को गुणकारक मानकर भोजन करता है, उसी के समान या अनुमानित दोषसहित शल्योद्धरण-शुद्धता जानना । इसमें कर्मबंध ही होता है, आत्मा की शुद्धता नहीं होती । ऐसा आलोचना का अनुमानित नामक दूसरा दोष कहा ।
सदासुखदासजी