
जं होदि अण्णदिट्ठं तं आलोचेदि गुरुसयासम्मि ।
अद्दिट्ठं गूहंतो मायिल्लो होदि णायव्वो॥579॥
देखा जो अपराध अन्य ने, उसे कहे जा गुरु के पास ।
नहिं देखा जो उसे छिपाए, उसको मायाचारी जान॥579॥
अन्वयार्थ : जो दोष अन्य ने देख लिया हो, उस दोष की तो गुरुओं के पास आलोचना करते हैं और जो दूसरों ने न देखा हो तो उसे गोप जाने वालेे/छिपा लेनेवाले साधु मायाचारी होते हैं, उन्हें दृष्ट नामक दोष होता है/लगता है ।
सदासुखदासजी