दिट्ठं व अदिट्ठं वा जदि ण कहेइ परमेण विणएण ।
आयरियपायमूले तदिओ आलोयणादोसो॥580॥
कोई देखे या न देखे दोष कहे गुरु-चरणों में ।
हो अत्यन्त विनम्र, अन्यथा दोष तीसरा गुरु कहें॥580॥
अन्वयार्थ : जो किसी के द्वारा देखा गया या न देखा गया दोष आचार्य के चरणों के निकट परम विनय पूर्वक नहीं कहते, वह तीसरा आलोचना दोष है ।

  सदासुखदासजी