जह वालुयाए अवडो पूरदि उक्कीरमाणओ चेव ।
तह कम्मादाणकरी इमा हु सल्लुद्धरणसुद्धी॥581॥
यथा रेत में गड्ढा खोदें किन्तु तुरत ही रेत भरे ।
वैसे यह आलोचन शुद्धि पुनः कर्म का बन्ध करे॥581॥
अन्वयार्थ : जैसे बालू रेत के टीले/ढेर में खोदा गया गह्ना, वह बालू निकालते-निकालते ही चारों ओर की बालू से भर जाता है, वैसे ही अन्य के द्वारा अवलोकन/देखे गये दोष की शुद्धता करनेवाले साधु, उनके मायाचार से कर्मग्रहण करनेवाली शल्योद्धरण शुद्धता होती है ।

  सदासुखदासजी