
बादरमालोचेंतो जत्तो जत्तो वदाओ पडिभग्गो ।
सुहुमं पच्छादेंतो जिणवयणपरंमुहो होइ॥582॥
जिनसे हो व्रत भंग उन्हीं स्थूल दोष का कथन करे ।
और छिपाए सूक्ष्म दोष वह क्षपक जिनागम विमुख रहे॥582॥
अन्वयार्थ : जिन-जिन दोषों के कारण व्रत से नष्ट हो जाये, भग्न/भंग हो जाय, उन-उन स्थूल दोषों की तो गुरुओं के निकट आलोचना करे और सूक्ष्म दोषों को छिपा जाये, वह साधु जिनेन्द्र के वचनों से पराङ्मुख हो जाता है, उनके बादर नामक दोष लगता है ।
सदासुखदासजी